मंगलवार, 25 मई 2010

खोयी थी खेल-खेल में........

..

ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ या खुदी को ढूँढ़ता हूँ
कैसी ये बेखुदी है मै किस को ढूँढ़ता हूँ !

कस्तूरी हिरन जैसे मैं भी दौड़ रहा हूँ
खुद से बाहर जाके ख़ुदा को ढूँढ़ता हूँ !

पढ़ ना सका हूँ मैं लिखा आज तक उसका
इन हाथों की लकीरों में मुकद्दर को ढूँढ़ता हूँ !

अश्कों के साथ-साथ सभी ख़्वाब बह गए
उन ख़ाक में खोये हुए ख्वाबों को ढूंढता हूँ !

खोयी थी खेल-खेल में कुछ ख़्वाहिशें मुझसे
उन ख्वाहिशों को आज भी राहों में ढूँढ़ता है !

दुनिया की भीड़ में हूँ इन्सां को ढूँढ़ता हूँ
गम के शहर में आके खुशियों को ढूँढ़ता हूँ !

तूफां के बीच में हूँ कस्ती को ढूँढ़ता हूँ
रेत के सहरा में निर्झर को ढूँढ़ता हूँ !

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20 टिप्‍पणियां:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

nirjhar bhai ..khayaal achhe hain ....qaifye par zara dhyan dijiye...

-ghazlon wala.. :)

दिलीप ने कहा…

waah bahut khoob sirji....zindagi hi ek talaash hai

sangeeta swarup ने कहा…

पढ़ ना सका हूँ मैं लिखा आज तक उसका
इन हाथों की लकीरों में मुकद्दर को ढूँढ़ता हूँ !

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल.... ना जाने क्या क्या ढूँढते हो...

अवध ने कहा…

खोयी थी खेल-खेल में कुछ ख़्वाहिशें मुझसे
उन ख्वाहिशों को आज भी राहों में ढूँढ़ता है !

वाह!! निर्झर जी. मजा आ गया. आपकी प्रेरणा से दो पंक्तियाँ मैंने भी लिख डाली हैं...स्वीकार करें.

इंसानियत है रुसवां, नफ़रत की तपिश में
मोहब्बत की छाँव दे, उस शज़र को ढूंढता हूँ.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

are nirjhar bhai ...main behar ki baat hi nahi kar raha....:) main bhi tuk ki hi baat kar raha hun ...ki tuk barabar nahi mila hai ...

रचना दीक्षित ने कहा…

सच ही कहा है, हमेशा की तरह बेहतरीन,लाजवाब पर ऐसा नहीं लगता मानो ये जिंदगी यूँ ही कुछ न कुछ ढूंढते ढूंढते ही हाथों से फिसल जायेगी

राज भाटिय़ा ने कहा…

हमेशा की तरह से अति सुंदर रचना... बस युही जिन्दगी बीत जाती है....

रंजना ने कहा…

वाह...वाह....वाह....
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल....हर शेर बेहतरीन....दिल की गहराइयों से निकले भाव दिल को छूने में समर्थ हैं....

बहुत बहुत सुन्दर रचना....

राजकुमार सोनी ने कहा…

दोस्त यदि आपका कोई संग्रह निकला हो मुझे भिजवाने की व्यवस्था करेंगे। आपको ठीक से पढ़ना चाहूंगा। बहुत ही शानदार।

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

पढ़ ना सका हूँ मैं लिखा आज तक उसका
इन हाथों की लकीरों में मुकद्दर को ढूँढ़ता हूँ !


अच्छा लिखा है .......पहली बार आया आपके ब्लॉग पर .....सार्थक लगा ..समय निकाल कर आपकी पुरानी पोस्ट भी पढूंगा ....फिलहाल इतना ही कहूँगा ....लिखते रहे ...आपको आपकी मंजिल जरूर मिलेगी ...अब शब्दों के इस सफ़र में आप तन्हा नहीं है हम भी आपके साथ है http://athaah.blogspot.com/

कविता रावत ने कहा…

तूफां के बीच में हूँ कस्ती को ढूँढ़ता हूँ
रेत के सहरा में निर्झर को ढूँढ़ता हूँ
.....Dil gahrayee se likhi gajal.. bahut achhi lagi..
Shubhkamnayne

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तूफां के बीच में हूँ कस्ती को ढूँढ़ता हूँ
रेत के सहरा में निर्झर को ढूँढ़ता हूँ ..

vaah ... bahut khoob likha hai .. maan ko saarthsk keta sher ..

Jayant Chaudhary ने कहा…

कस्तूरी हिरन जैसे मैं भी दौड़ रहा हूँ
खुद से बाहर जाके ख़ुदा को ढूँढ़ता हूँ !

Waah... Bahut sundar.

Aur ant men aapanaa naam bhi sundarataa ke saath likhaa hai...

तूफां के बीच में हूँ कस्ती को ढूँढ़ता हूँ
रेत के सहरा में निर्झर को ढूँढ़ता हूँ !

sangeeta swarup ने कहा…

आपकी यह पोस्ट ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
http://charchamanch.blogspot.com/

स्वाति ने कहा…

खोयी थी खेल-खेल में कुछ ख़्वाहिशें मुझसे
उन ख्वाहिशों को आज भी राहों में ढूँढ़ता है !
सुन्दर ग़ज़ल....दिल को छूने में समर्थ !!

आशीष/ ASHISH ने कहा…

WAAAAAAAAH!!!!!
UMDAAAAA!!!!

बेचैन आत्मा ने कहा…

दुनिया की भीड़ में हूँ इन्सां को ढूँढ़ता हूँ
गम के शहर में आके खुशियों को ढूँढ़ता हूँ !
..वाह!

kshama ने कहा…

Ab to barsaat shuru ho gayi.ab 'nirjhar' ne bahna chahiye! Kahan hain aap?

rohitler ने कहा…

पढ़ ना सका हूँ मैं लिखा आज तक उसका
इन हाथों की लकीरों में मुकद्दर को ढूँढ़ता हूँ

क्या बात है ! वाह !!

CS Devendra K Sharma ने कहा…

तूफां के बीच में हूँ कस्ती को ढूँढ़ता हूँ
रेत के सहरा में निर्झर को ढूँढ़ता हूँ !

waaaaaah