शनिवार, 25 सितंबर 2010

गले लगा तो जरा

 .

ना कर तर्क-ए-वफ़ा कांटे पे जरा तोलूँगा
खरा है कौन यहाँ सारे भरम खोलूँगा !

शूली पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा !

सुना है शहर में आब-ओ-दाना मिलता है
भरे जो पेट, तो मै भी सड़क पे सो लूँगा !

हासिल हुआ है क्या तुझे घर मेरा जलाकर
मैं तो बेबस हूँ बहुत, भर के आह रो लूँगा !

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा

बहुत सहेज के रक्खी हैं भेंट यारों की
गले लगा तो जरा दिल की गिरह खोलूँगा !

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23 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुना है शहर में आब-ओ-दाना मिलता है
भरे जो पेट, तो मै भी सड़क पे सो लूँगा

वाह ..बहुत खूबसूरत गज़ल

tapish ने कहा…

bahut khub sir ek baar phir se apne gazab likha hai

ktheLeo ने कहा…

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा

वाह! सुन्दर रचना, सुन्दर प्रस्तुति!

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति.धन्यवाद

रचना दीक्षित ने कहा…

सुना है शहर में आब-ओ-दाना मिलता है
भरे जो पेट, तो मै भी सड़क पे सो लूँगा
वाह! सच दिल से लिखी गयीं बहुत ही गहरी बातें बहुत खूबसूरत गज़ल

अवधेश पाण्डेय ने कहा…

भरे जो पेट, तो मै भी सड़क पे सो लूँगा !

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wah... sach hee kaha hai bhukhe bhajan na hohi gopala.

रंजना ने कहा…

सुना है शहर में आब-ओ-दाना मिलता है
भरे जो पेट, तो मै भी सड़क पे सो लूँगा !

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा !


वाह...वाह...वाह... क्या लिखा है...लाजवाब !!! बेहतरीन !!!!

एकदम मन को छू गयी यह सुन्दर रचना...

ऐसे ही नायाब लिखते रहो...लेखनी दिन प्रतिदिन निखरती जाए...बुलंदी पर पहुँचो...
अनंत शुभकामनाएं...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

वाह वाह वाह वाह ....
गज़ब लिखा है यार .....
काफी दिनों के बाद आये हो ....
लेकिन ये रचना मस्त लाये हो....
आभार .......

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा ..

वैसे तो सभी पंक्तियाँ उम्दा हैं
लेकिन ये पंक्तियाँ मुझे सबसे ज़्यादा
अच्छी लगी .

shikha varshney ने कहा…

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा

बेहतरीन पंक्तियाँ
बहुत खूबसूरत गज़ल.

sada ने कहा…

बहुत सहेज के रक्खी हैं भेंट यारों की
गले लगा तो जरा दिल की गिरह खोलूँगा !

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति,
इस सुन्‍दर रचना को पढ़वाने का माध्‍यम चर्चा मंच था, जहां एक से बढ़कर एक रचनाओं का संगम हुआ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शूली पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा ...

लाजवाब ग़ज़ल है ... ये शेर तो खूब जिंदादिली की मिसाल है ... सुभान अल्ला ....

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी रचना

कविता रावत ने कहा…

बहुत सहेज के रक्खी हैं भेंट यारों की
गले लगा तो जरा दिल की गिरह खोलूँगा !
...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

ज्योति सिंह ने कहा…

ना कर तर्क-ए-वफ़ा कांटे पे जरा तोलूँगा
खरा है कौन यहाँ सारे भरम खोलूँगा !

शूली पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा !
bahut hi sundar ,sach haarta nahi kabhi bhale jakhmi hota rahe .

hem pandey ने कहा…

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा
- ऐसे लोग बहुसंख्यक होने चाहिए |

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

शूली पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा !
..सुंदर भाव।

ZEAL ने कहा…

शूली पे चढ़ा दो या सर कलम कर दो
सच कड़वा ही सही मैं तो सच ही बोलूँगा !..

That is all we expect !

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shikha varshney ने कहा…

अमन के बीज लिए फिरता हूँ अपने दामन में
रक्तरंजित है धरा फिर भी कहीं बो लूँगा
बेहद खूबसूरत गज़ल.

उपेन्द्र ने कहा…

बहुत सहेज के रक्खी हैं भेंट यारों की
गले लगा तो जरा दिल की गिरह खोलूँगा !

very nice neer ji

केवल राम ने कहा…

हासिल हुआ है क्या तुझे घर मेरा जलाकर
मैं तो बेबस हूँ बहुत, भर के आह रो लूँगा !
अरे बेवसी का फायदा कौन नहीं उठता ...दिल को छु लेने वाली पंक्तियाँ

चलते -चलते पर आपका स्वागत है

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

badhiya gazal.. achha likhte hain aap.. pahli baar aapke blog par aayaa achha laga mujhe..