मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

धन की खातिर



बहुत दिन बाद एक कोशिश
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धन की खातिर लोग यहाँ
सुख-चैन नींद, खोते देखे !
दौलत-शौहरत पाकर भी
कुछ लोग यहाँ, रोते देखे  !
उल्लू जैसी हो गयी फितरत
रात जगे दिन सोते देखे !  
इंसानों की जात ना पूछो 
मन मैला तन धोते देखे !
के गैरों का गिला करूँ, जब 
अपने ही कांटे बोते देखे !
मूल्य रहे ना मान रहा, बस
रिश्तों के गट्ठर ढोते देखे !
देखे पीर फ़कीर 'नीर' सब 
नेता और अभिनेता देखे !
गद्दी खातिर बेच दिया सब 
देश के टुकड़े होते देखे !!

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7 टिप्‍पणियां:

Anju ने कहा…

बहुत अच्छा ...यथार्थ को चित्रित करती पंक्तियाँ .....

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब ...
शुभकामनायें आपको !

prritiy----sneh ने कहा…

insaani fitrat ko bakhubi darshaya hai.

shubhkamnayen

आशा ढौंडियाल ने कहा…

bahut khub neer sahab, aaj ke parivesh ka katu saty.....shubhkamnayen

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

देखो इनकी फ़ितरत यारों,
बगुला-भगत जमे सब बैठे!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

@मेरी बेटी शाम्भवी का कविता-पाठ

ZEAL ने कहा…

waah...great creation...