गुरुवार, 15 जनवरी 2009

रात के जैसी काली चादर ...

रात के जैसी काली चादर ओढ़ मेरा दिन आता है ।
सूरज तेरे दर पे दस्तक देने चलकर आता है ॥

देख के मेरे घर का रस्ता जुग्नू भी छुप जाता है ।
आसमान का हर तारा घर झांकने  तेरे आता है ॥

काला बादल साथ हवा के देख मुझे उड़ जाता है ।
देख के बिखरी जुल्फें तेरी झूम के सावन आता है ॥

में जो कदम रखूँ बागों में सब वीराँ हो जाता है ।
तू हँस दे जो वीराँनों में वीराँ गुलशन हो जाता है ॥

जिस रस्ते पाँव रखूँ में निर्झर मंजिल से कट जाता है ।
तू जिस रस्ते पाँव रखे वो मंजिल से मिल जाता है ॥

6 टिप्‍पणियां:

manvinder bhimber ने कहा…

बहुत गंभीर rachana है .....badhaaee sweekaarain

नीरज गोस्वामी ने कहा…

काला बादल साथ हवा के देख मुझे उड़ जाता है ।
देख के बिखरी जुल्फें तेरी झूम के सावन आता है ॥

में जो कदम रखूँ बागों में सब वीराँ हो जाता है ।
तू हँस दे जो वीराँनों में वीराँ गुलशन बन जाता है
वाह...वा...बहुत ही लाजवाब रचना है...बधाई...
नीरज

रंजना ने कहा…

bahut sundar aur bhaavpoorn rachna hai.badhai.

Udan Tashtari ने कहा…

में जो कदम रखूँ बागों में सब वीराँ हो जाता है
तू हँस दे जो वीराँनों में वीराँ गुलशन बन जाता है

--बहुत उम्दा!! वाह! आनन्द आ गया.

श्रद्धा जैन ने कहा…

aisa hi hota hai ji
kahin kahin zindgi saath se chalti hai
jab do rekha milti hai to rasta aasan ho jata hai

ashvani ने कहा…

aaj ek naya neer mil gaya jiska abhi tak pata hi nahi tha.
---------------bahut PYARA.
Ashvani Sharma