मंगलवार, 3 मार्च 2009

सफर जिंदगी का ..

दरिया है वक़्त का ये
बहना है सबको इसमें
बेबस बुझा- बुझा सा
तनहा मैं बह रहा हूँ !

न बस में पकड़ सकूं
उस कारवाँ को मैं
उड़ती है जिसकी राह में
गर्द -ए-सफर अभी तक !

ना हक है रुक के राह में
करूँ उसका इंतजार
आएगा मेरे बाद जो
तनहा मेरी तरह !

वक़्त-ए-सफर अलग है
सबकी राह-ए-जिंदगी का
मंजिल है सबकी एक
मुझे बस इतनी ख़बर है !!

7 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

रंजना ने कहा…

भावुक और मार्मिक अभिव्यक्ति...अंतिम पंक्तियों में चिरसत्य को सुन्दरता से विवेचित किया है. सुन्दर रचना....

mehek ने कहा…

bahut sundar bhav

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है...बधाई
नीरज

शोभा ने कहा…

अच्छा लिखा है।

Udan Tashtari ने कहा…

आपसे मिलना तो मेरा सौभाग्य होता. खैर, अप्रेल में वापस लौटते फिर ग्रेटर नोयडा आना होगा. उस वक्त मुलाकात अवश्य होगी. अनेक शुभकामनाऐं. अपना फोन न्म्बर मुझे ईमेल से भेज दें:

sameer.lal एट gmail.com

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुंदर !
घुघूती बासूती