गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

कोई दरिया नही हूँ मैं



अब क्या डुबोयेंगीं मुझे
तूफां की ये मौजें
साहिल हूँ समुन्दर का
कोई कस्ती नहीं हूँ मैं !

अब क्या बुझायेंगी मुझे
गम की ये आंधियां
जलता हूँ अनल जैसे
कोई दीपक नहीं हूँ मैं !

ना खौफ रहबरी का
ना डर है दुश्मनों से
अभेद दुर्ग हूँ एक
कोई बस्ती नहीं हूँ मैं !

दरिया को मोड़ने का
रखता हूँ हौसला भी
जरा, लड़ने दे वक़्त से
अभी हारा नहीं हूँ मैं !

मंथन तो कर के देख
अमृत भी मिलेगा
समेटे हूँ मैं सागर को
कोई दरिया नही हूँ मैं !!

..

16 टिप्‍पणियां:

Jayant Chaudhary ने कहा…

Kyaa baat hai..

Aanand hi aanand..

~Jayant

अनिल कान्त : ने कहा…

भाई वाह ...मजा आ गया ....

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Shefali Pande ने कहा…

neer....bahut sundar likha hai

Mired Mirage ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया लिखा है।
घुघूती बासूती

SWAPN ने कहा…

manthan to karke dekh................dariya nahin hun main. bahut sunder panktian. umda ra
chna ke liye nirjhar ji badhai.

श्यामल सुमन ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति। कहते हैं कि-

तूफान से गुजरकर बहुत मुतमइन थे हम।
साहिल पे डूब जायेगी कश्ती खबर न थी।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

विनय ने कहा…

आपकी लेखनी बहुत पसंद आयी।

---
चाँद, बादल और शाम

mehek ने कहा…

दरिया को मोड़ने का
रखता हूँ हौसला भी
जरा, लड़ने दे वक़्त से
अभी हारा नहीं हूँ मैं !
waah bahut hi khubsurat,aashawadi.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया.

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर रचना ..

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

बीर रस से ओत-प्रोत सुन्दर , प्रेरक जोश का सन्देश देती कविता.
बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

हौसला बढाती हुई सी सुन्दर कविता !!!

Motivating !!

Shefali Pande ने कहा…

thanx for being my follower...

Mohd Jeeshan ने कहा…

har baar ki tarah aapne is baar bhi accha likha hai.

sakhi with feelings ने कहा…

neer
hamesha hi apka likha pasand aata hai hame to..is bara bhi bhaut achi joshili rachna laye
acha laga
sakhi

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

बहुत खूब कहा है आपने। दरिया की ही तरह अपने भावों को सहज रूप में बहा दिया है।

-----------
TSALIIM
SBAI