शनिवार, 29 अगस्त 2009

अश्क बनकर बह..

सहरा में भटकता राही और प्यास की व्याकुलता
भूख से बिलखते बच्चे की बेबस माँ का मर्म
बेटे की अर्थी से झुकता बेसहारा बाप का कन्धा
शूखती फसल के पत्तो को देखते किसान की बेकशी
बाढ़ में बहती जिंदगी और मौत के आलिंगन का अहसास
मेरे दिल में ऐसे ही कुछ
अहसासों का ज्वार उठता है
और मै बांधने लगता हूँ
उन सारे अहसासों को
शब्दों की डोरी से कविता की माला में
लेकिन ये अहसास, मेरी कलम रोक लेते है
और में सिर्फ़ और सिर्फ़ महसूस करता हूँ
इन अहसासों के बे-इंतिहा दर्द और बेबसी को
शायद कोई नही बांध सकता इन अहसासों को
तभी तो ये सारे अहसास
बरसाती नदी की तरह
सारे तटबंधों को तोड़कर
आँखों की संकरी गलियों से
अश्क बनकर बह जाते है॥

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12 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

सुन्दर रचना है।

ktheLeo ने कहा…

वाह क्या बात है, वास्तव में कमाल है.

ओम आर्य ने कहा…

बहुत बहुत बढिया.......अतिसुन्दर

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना जी.
धन्यवाद

M VERMA ने कहा…

बेहतरीन रचना

श्यामल सुमन ने कहा…

अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया। वाह।

अमिताभ मीत ने कहा…

तभी तो ये सारे अहसास
बरसाती नदी की तरह
सारे तटबंधों को तोड़कर
आँखों की संकरी गलियों से
अश्क बनकर बह जाते है॥

Bahut khoob.

विपिन बिहारी गोयल ने कहा…

बहुत अच्छे

योगेश स्वप्न ने कहा…

तभी तो ये सारे अहसास
बरसाती नदी की तरह
सारे तटबंधों को तोड़कर
आँखों की संकरी गलियों से
अश्क बनकर बह जाते है॥

sunder rachna badhaai.

रंजना ने कहा…

वाह वाह वाह !!!!!! क्या बात कही है.....एकदम सच !!!

पीडा को शब्दों कि परिधि में बाँध पाना सहज तो नहीं...पर उसे अभिव्यक्त करने को जो लेखनी प्रस्तुत होती है,यह उस पीडा के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि ही तो है...

बहुत ही भावपूर्ण इस रचना के लिए वाह !!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

SUNDAR RACHNA HAI .... BHAAV POORN

naveentyagi ने कहा…

kahan ho bahut din se koi geet kyon nahi likkha.