गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

कदम धरती पे रहने दो.

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कदम धरती पे रहने दो
भले ही नभ पे हो नजरें 
सितारा बनके तुम टूटो
कहीं ऐसा ना हो जाये

गुमां था जिनको पंखों पे
जो निकले नापने नभ को
थके हारे वो पंछी भी
जमीं पर लौट कर आये

ये माना की जरुरी है
ये दौलत और ये सौहरत
मगर किस काम के ये सब
जो रिश्ते ही जला जाये

अपना घर बनाने को
शज़र तूने जो काटा है
ना जाने कितने घर इसपे
परिंदों ने बनाये थे .


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14 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

गुमां था जिनको पंखों पे
जो निकले नापने नभ को
थके हारे वो पंछी भी
जमीं पर लौट कर आये

अपना घर बनाने को
शज़र तूने जो काटा है
ना जाने कितने घर इसपे
परिंदों ने बनाये थे
Bahut Khoob, Sundar !!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

लौटना तो सबको होता ही है एक न एक दिन - चाहे नापने आकाश निकलें या थाहने सागर !

राज भाटिय़ा ने कहा…

ये माना की जरुरी है
ये दौलत और ये सौहरत
मगर किस काम के ये सब
जो रिश्ते ही जला जाये
बहुत सुंदर लगी आप की यह रचना.

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut sunder rachna.

ये माना की जरुरी है
ये दौलत और ये सौहरत
मगर किस काम के ये सब
जो रिश्ते ही जला जाये

behatareen.

Rohit Jain ने कहा…

Agar chahun ki is rachna ki koi pankti dil tak pahunchi to poori kavita hi likhni padegi........shukriya achchhi rachna ke liye.........

singhsdm ने कहा…

अपना घर बनाने को

शज़र तूने जो काटा है

ना जाने कितने घर इसपे

परिंदों ने बनाये थे .

बहुत सुन्दर मन को छु गयी ये पंक्तियाँ

रंजना ने कहा…

अपना घर बनाने को

शज़र तूने जो काटा है

ना जाने कितने घर इसपे

परिंदों ने बनाये थे .


Waah.....Waah......Waah....LAJAWAAB!!!!

BAHUT HI SUNDAR RACHNA....Badhai...

Devendra ने कहा…

अपना घर बनाने को
शज़र तूने जो काटा है
ना जाने कितने घर इसपे
परिंदों ने बनाये थे .
--वाह!

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

अपना घर बनाने को

शज़र तूने जो काटा है

ना जाने कितने घर इसपे

परिंदों ने बनाये थे .
.... बहुत ही खूबसूरत रचना !!!!!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

achhi rachna...

sandhyagupta ने कहा…

कदम धरती पे रहने दो
भले ही नभ पे हो नजरें
सितारा बनके तुम टूटो
कहीं ऐसा ना हो जाये

गुमां था जिनको पंखों पे
जो निकले नापने नभ को
थके हारे वो पंछी भी
जमीं पर लौट कर आये

Arth aur shilp dono hi dristi se bahut achche.shubkamnayen.

ज्योति सिंह ने कहा…

ये माना की जरुरी है

ये दौलत और ये सौहरत

मगर किस काम के ये सब

जो रिश्ते ही जला जाये
main byaan nahi kar sakti ,kavita kitni achchhi lagi ,ek haqikat .bahut hi behtrin

knkayastha ने कहा…

नीर साहेब,
आपके ब्लॉग पर आज ही आया हूँ...जाने क्यूँ मेरी नज़र ही नहीं पड़ी...किसी एक ही रचना के बारे में आज कुछ न कहूँगा...
बहुत ही उम्दा कवितायेँ हैं...पठनीय और सोचनीय...निर्झर नीर की तरह अविरल-अनवरत-असरदार....

शारदा अरोरा ने कहा…

रचना अच्छी लगी । आपके बारे में मेरी राय ये है कि आप रिश्तों की चोट खा चुके है , जैसा कि इस उम्र में होता है जिन्दगी की रंगीनियाँ ..उम्मीदें आपको पटरी पर ला रही हैं ...अपने धर्म को भी आप बहुत मानने वाले हो । अब बताइये आपके लेखन को पढ़ कर मेरा प्रीडिक्शन कितना सही है ?