सोमवार, 16 नवंबर 2009

स्वाभिमान..

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शूक्ष्म अंतरित शब्द
अभिमान और स्वाभिमान
ये शब्द समेटे है अपने आप में
सागर की गहराई और
अनंत आकाश
इतिहास गवाह है
एक ओर जहां .........
दुर्योधन का अभिमान
महाभारत का कारण बना
रावण के अभिमान ने
रामायण की रचना की .
दूसरी ओर वहीं ...............
अपने स्वाभिमान की खातिर
महाराणा प्रताप जैसे वीर ने
जंगलो की ख़ाक छानी
भगतसिंह ने हँसते-हँसते
फांसी का फंदा चूमा.
मैं स्वाभमानी हूँ
इसीलिए पूजता हूँ उन्हें
जिनसे जिंदा है देश की
आन, मान और शान
फक्र से कहता हूँ मैं
"मेरा भारत महान"

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10 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता,
मगर अफ़सोस कि
आज मान बिकता है
बाजारों में !
स्वाभिमान को भी
हासिये पर
ला खडा किया
हमारे इन
कुटिल कर्णधारों ने !!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अभिमान और स्वाभिमान के अंतर को स्पष्ट करती लाजवाब रचना है ........

रंजना ने कहा…

बहुत दिनों बाद पीड़ा के रंग से इतर इस जीवंत और प्रेरनादायी रूप ने अपर हर्षित किया ....बहुत ही सुन्दर ढंग से तुमने अभिमान और स्वाभिमान के अंतर को निरूपित किया है.....
मन को छू लेने वाली इस सुन्दर रचना के लिए तुम्हें बहुत बहुत शाबासी और आशीर्वाद....

ऐसे ही सुन्दर लिखते रहो....

M VERMA ने कहा…

मैं स्वाभमानी हूँ
इसीलिए पूजता हूँ उन्हें
जिनसे जिंदा है देश की
आन, मान और शान
वाकई यह हमारे लिये तो स्वाभिमान ही है

योगेश स्वप्न ने कहा…

nirjhar ji , desh ke liye abhimaan aur swabhimaan ko darshati sunder kriti, lekin godial ji ne bhi sahi kaha hai .

Rajey Sha ने कहा…

दरअसल भगत सि‍ंह और महाराणा प्रताप ने अपने नि‍जी स्‍वार्थों के लि‍ए नहीं इंसानि‍यत के अधि‍कारों की बात की थी जि‍नका अभि‍मान या स्‍वाभि‍मान से लेना देना नहीं।

अभि‍मान स्‍वाभि‍मान इन शब्‍दों में कोई अन्‍तर नहीं ये अहं का पोषण ही करते हैं। और "स्‍व" यानि‍ नि‍जी अपना,"अभि‍मान" यानि‍ घमंड ये स्‍वाभि‍मान शब्‍द ही गलत और नि‍रर्थक है केवल 'मान' ही घमंड को व्‍यक्‍त करने के लि‍ए पर्याप्‍त नहीं है क्‍या?

निर्झर'नीर ने कहा…

Rajey Sha ji

bas kuch khayal aaye shabdo ka jod-tod kiya or likh diya ...

vishleshan kiya nahi ,aapki pratikriya ke liye shuk,r_guzaar hun.

shayad aap jo kahte hai vo hi sahi ho?

MUFLIS ने कहा…

aan , baan , shaan ,
aur swabhimaan ko
paribhaashit karti huee
bahut sundar rachnaa par
dheroN badhaaee .

divya ने कहा…

abhimaan awem swabhimaan ki guthi iss nayab tarike se suljhane k liye dhanyawaad....
dono ek dusre se kabhi kabhi yun lipat jate hai ki manushya antar karne me asaksham ho jata hai..parinaam dukhad hota hai...
kavita har rup me prashansniya hai..
badhayi sweekaren...

ज्योति सिंह ने कहा…

sahi kahan mera bharat mahan ,aap jaise kalakaar ho jahan ,wo desh mahan hi hoga ,kavyaanjali par aaye khushi hogi .