गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

लकीर-ए-दस्त का लिक्खा

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लकीर-ए-दस्त का लिक्खा समझ आया नहीं मुझको !   
तू ही मुज़रिम तू ही मुंसिफ़, गुनाह तेरा सजा मुझको !!
 
ये मौसम का बदलना तो, मुझे भी रास आता  है !
यूँ अपनों के बदलने का,चलन भाया नहीं मुझको !!

पढ़े शाम-ओ-सहर जिसने क़सीदे शान में मेरी !
वो ही अब ढूंढता है हाथ में खंजर लिए मुझको !!

अगर हो मौज तूफानी तो साहिल भी लरजता है !
समय का खेल है सारा, ना यूँ इल्जाम दे मुझको !!

लकीरें खींचकर कागज पे, कुछ खुदगर्ज लोगों ने !
वतन को बांटकर टुकड़ों में, बेघर कर दिया मुझको !!

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20 टिप्‍पणियां:

Khare A ने कहा…

neer sahib, ek behtreen nazm peshkarne ke liye
dils e badhai

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

ktheLeo ने कहा…

वाह!सुन्दर अभिव्यक्ति! मेरा कथन:

"जब तलक हाथ में थी लकीरें थीं,
धुली पसीने से तो वो तकदीरेंथीं!"

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब ..सुन्दर गज़ल

रंजना ने कहा…

ये ऋतुओं का बदलना तो, मुझे भी खूब भाता है !
यूँ अपनों के बदलने का,चलन भाया नहीं मुझको !!


वाह वाह वाह....
एक से बढ़कर एक क्या शेर गढ़े हैं तुमने.....
लाजवाब सभी से सभी लाजवाब !!!

मनभावन ,बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल....
ऐसे ही सुन्दर,उत्कृष्ट लिखते रहो...
शुभाशीष...

स्वाति ने कहा…

बहुत ही लाजवाब...बहुत खूब...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

ये ऋतुओं का बदलना तो, मुझे भी खूब भाता है !
यूँ अपनों के बदलने का,चलन भाया नहीं मुझको !!

लाजवाब,लाजवाब,लाजवाब.

Jayant Chaudhary ने कहा…

"लकीर-ए-दस्त का लिक्खा समझ आया नहीं मुझको !
वो ही मुज़रिम वो ही मुंसिफ़ गुनाह उसका सजा मुझको !!"


वाह वाह वाह..... निर्झर नीर..... कुछ नीर हमारी आखों से जहर चले..

hempandey ने कहा…

लकीरें खींचकर कागज पे, कुछ खुदगर्ज लोगों ने !
वतन को बांटकर टुकड़ों में, बेघर कर दिया मुझको !!

- सुन्दर |

रचना दीक्षित ने कहा…

पढ़े शाम-ओ-सहर जिसने क़सीदे शान में मेरी !
वो ही अब ढूंढता है हाथ में खंजर लिए मुझको !!

यूँ तो सारे शेर ही उम्दा है. बहुत अच्छी प्रस्तुति.

सतीश सक्सेना ने कहा…

अच्छा और सराहनीय !!शुभकामनायें !

कुलदीप "अंजुम" ने कहा…

नीर साहब
बहुत ही उम्दा नज़्म !
बहुत बहुत बधाई

सुमन'मीत' ने कहा…

bahut khoob.....antim panktiyan mann ko choo gai...

सतीश सक्सेना ने कहा…

एक अच्छी रचना ....शुभकामनायें आपको !

Dheerendra ने कहा…

Bahut khoob Neer bhai...

Pratik Maheshwari ने कहा…

आपके लेखन की शैली और तरीका बहुत अच्छा लगा और पंक्तियाँ तो बेहतरीन थीं..

आभार
चलता जीवन पर आपके विचारों का इंतज़ार है

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति|

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ|

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

लकीरें खींचकर कागज पे, कुछ खुदगर्ज लोगों ने !
वतन को बांटकर टुकड़ों में, बेघर कर दिया मुझको !!


waahhhhh

neeraj ji ye bataiye kaunsi pankti par wah wah na karun?????

har pankti lajawab hai........

Patali-The-Village ने कहा…

नवसंवत्सर २०६८ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

ये ऋतुओं का बदलना तो, मुझे भी खूब भाता है !
यूँ अपनों के बदलने का,चलन भाया नहीं मुझको !!


बहुत उम्दा ग़ज़ल....