बुधवार, 4 मई 2011

हर आँगन में ख़ामोशी है

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हर आँगन में ख़ामोशी है
सब उजड़ा-उजड़ा लगता है
दिल में लावा पिघल रहा 
मन उखड़ा-उखड़ा लगता है
पथराई सी आँखें है  
हर पेट में पीठ समायी है  
ईमान बचा के रख्खा है 
मजदूर की यही कमाई है  
भावहीन है हर चेहरा 
हर चेहरे में ऱब दिखता है  
कौन यहाँ अहसास ख़रीदे 
ज़िस्म यहाँ पे बिकता है  
आन, मान, मर्यादा की 
बातें अब बहुत पुरानी है 
ना राम यहाँ के राजा है 
ना लक्ष्मीबाई रानी है


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13 टिप्‍पणियां:

ज्योति सिंह ने कहा…

ना राम यहाँ के राजा है
ना लक्ष्मीबाई रानी है
kya baat hai ,bahut hi sundar likha hai .reet badal gayi ,preet badal gayi ,haar badal gayi jeet badal gayi .

रचना दीक्षित ने कहा…

कितना कटु, पर है तो सत्य ही. बेहतरीन प्रस्तुति.

kshama ने कहा…

आन, मान, मर्यादा की
बातें अब बहुत पुरानी है
ना राम यहाँ के राजा है
ना लक्ष्मीबाई रानी है
Kya baat hai! Bahut dinon baad aapko padhne ka mauqa mila aur wo bhee aisee sashakt rachana ke saath!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पथराई सी आँखें है
हर पेट में पीठ समायी है
ईमान बचा के रख्खा है
मजदूर की यही कमाई है

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत मार्मिक प्रस्‍तुति, धन्यवाद

स्वाति ने कहा…

ईमान बचा के रख्खा है
मजदूर की यही कमाई है
kya baat hai..bahut dino ke bad ek bar fir sunder rachna padhne ko mili..

tapish ने कहा…

bahut acha likha hai sir ji

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ईमान बचा के रख्खा है
मजदूर की यही कमाई है

वाह..वाह....
बहुत खूब .....

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब निर्झर जी ! खूबसूरत भाव और सरलता आपकी खासियत है ! शुभकामनायें !

अवधेश पाण्डेय ने कहा…

सच के करीब, आज की स्थिति का सजीव चित्रण.
सुन्दर रचना.

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" ने कहा…

ईमान बचा के रख्खा है
मजदूर की यही कमाई है
भावहीन है हर चेहरा
हर चेहरे में ऱब दिखता है

kyaa baat hai ji...

sahi kaha..imaandaari se badhkar kamaai aur kya ho sakti hai!!!!

aur bhaawheen chehre me bhi rab dikhne lage to kahna hi kya!!!!!!!!

behtareen soch....

रंजना ने कहा…

क्या लिखा है....

वाह...वाह...वाह....

बहुत बहुत सुन्दर, मर्मस्पर्शी, प्रभावशाली...

मन गदगद हो गया पढ़कर...

शुभाशीष !!!

मो. कमरूद्दीन शेख ने कहा…

ईमान बचा के रख्खा है
मजदूर की यही कमाई है
bahut hi sach kaha hai apne. Hazari prasad dwiwedi ka nibanch yad ata hai " kya nirash hua jaye" jisme woh kahate hain ki sachchai bhiru aur bebas logon ke liye hi bachi hai.
bahut hi achchhi abhivyakti.