गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

कमज़र्फ आँखें

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दिल के सागर में 
जब-जब आते है
ज़ज्बातों के झंझावात
तब-तब उठती हैं 
बेबसी और वेदना की 
ऊँची-ऊँची लहरें
सुनामी की तरह 
जिन्हें ये कमज़र्फ आँखें 
चाहते हुए भी 
रोक नहीं पाती
और बहा देती है
उस नमक को
जो जमा किया था
वक़्त की छलनी से 
दर्द को छानकर
दिल की तलहटी में.


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11 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

Bahut,bahut sundar!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जज्बातों के झंझावात भिगो जाते हैं हर मन को ... और आंसू उमड़ आते हैं ...

avanti singh ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना है ,पहली बार आप के ब्लॉग पर आना हुआ,कई रचनाएँ पढ़ी ,बहुत ही उम्दा लिखते है आप....उम्मीद है फिर जरुर आना होगा इस ब्लॉग पर....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन वेदना को उकेरती ये कमज़र्फ आँखे ..बहुत खूबसूरत नज़्म

रचना दीक्षित ने कहा…

आपके जज़्बातों के झंझावात ने वाकई सुनामी ला दी है. बहुत ही सुंदर रचना है यह. बधाई.

रचना दीक्षित ने कहा…

सचमुच चिंता का विषय है. सुंदर कविता बधाई.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अन्दर की सुनामियों को कोई देख नहीं पाता , चट्टानों सा हौसला भी कई बार बहने लगता है ... चलना है तो बांधना ही है

anjana ने कहा…

बहुत सुन्दर ..

सुमन'मीत' ने कहा…

जिन्हें ये कमज़र्फ आँखें
चाहते हुए भी
रोक नहीं पाती
और बहा देती है
उस नमक को
जो जमा किया था
वक़्त की छलनी से
दर्द को छानकर
दिल की तलहटी में.

वाह ...बहुत सुन्दर

रंजना ने कहा…

वाह...यह भी लाजवाब...

क्या खूब मंज गयी है तुम्हारी लेखनी...भाव को सीधे ह्रदय तक पहुंचा देती है...

M VERMA ने कहा…

बिम्बों की ख़ूबसूरती
बहुत भावपूर्ण