गुरुवार, 19 मार्च 2015

'परिवर्तन '


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इस तरह भी ना कहो
भले की भी, बुरी लगे
मना भी इस तरह करो 
कि ना भी,ना सी,ना लगे !

ये दौर कुछ अलग सा है 
यहाँ दोस्त भी फ़लक सा है
कहीं पड़ ना जायें सिलवटें
गले लगें, की ना लगें !

वो गैर की सुनें भी क्यूं 
जिन्हें बाप की बुरी लगे
बेटे इस क़दर बड़े हुए 
की माँ भी,माँ सी,ना लगे !

काफियों के फेर में क्यूँ
मन की मन में ही रहे 
'नीर' ने मन की कही 
भली लगे ,बुरी लगे !!
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4 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

वाह...क्या लिखी है ....
बेहतरीन....बहुत बहुत अच्छी।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (20-03-2015) को "शब्दों की तलवार" (चर्चा - 1923) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Abha Khetarpal ने कहा…

waah bahut sunder

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत खूब ... मन की मन में रहे अगर काफिये की फेर में पड़ना है तो ...