शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

कोई तो वज़ा है .

हर अंज़ाम से वाकिफ़ हूँ मुझे सब जुर्म पता है !
जलता रहूँ इस आग में यही अब मेरी सज़ा है !!

चाहूँ तो एक पल में ये दूनिया में छोड़ दूँ !
जीता हूँ मगर आज भी ये तेरी रज़ा है !!

माना की मोहब्बत में मज़ा है जीने मरने का !
तुमसा हो जो दिलकश तो अदावत में भी मज़ा है !!

रूह का ज़िस्म से जाना कहते है कज़ा माना !
गुलामों से ज़रा पूछो गुलामी भी तो कज़ा है !!

गुज़रा है कोई तूफां या आगाज़ है आने का !
ख़ामोश समुंदर कि कोई तो वज़ा है !!

7 टिप्‍पणियां:

Shashwat Shekhar ने कहा…

खामोश समंदर की कोई तो वजा है.....बहुत खूब

"अर्श" ने कहा…

akhiri sher to kahar hai bahot khub likha hai aapne dhero badhai aapko...

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा ने कहा…

हर अंज़ाम से वाकिफ़ हूँ मुझे सब जुर्म पता है !
जलता रहूँ इस आग में यही अब मेरी सज़ा है !!
बहुत खूब

बेनामी ने कहा…

अर्श साहब से पू‌री तरह सहमत हूँ। क्या शेर है वाह वाह!!! :-))

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन कोशिश है आप की ...मेरे ख्याल में वज़ा शब्द नहीं होता वजह होता है...किसी उस्ताद से पूछ लें बेहतर होगा...
नीरज

NirjharNeer ने कहा…

aap sab ka dil se shukria aapne padha or saraha ..

नीरज गोस्वामी jii

aap bhi to ustaad ho aapne kah diya to poochne ki jarurat hi kahan bachii hai.
accha laga aapne margdarshan kiya.
shukria .

रंजना ने कहा…

Waah ! sundar rachna hai.gahre bhavon ko khoobsurtee se abhivyakti dee hai aapne.