शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

पी-पी के अश्क आज ...

चढ़ते सूरज को सलामी सब की मिलती है !
अगर ग़र्दिश में हो तारे कोई पानी नही देता !!

जवां जिस्मों की राहों में सभी पलकें बिछाते हैं !
कोई बेबस बुढापे को सहारा क्यों ? नही देता ! !

दौलत के धागों से बँधे हैं अब तो सब रिश्ते !
मुफ़लिस की मय्यत को कोई कंधा नही देता !!

ना कर इंसाफ़ की बातें यहाँ मुजरिम ही मुंसिफ़ है !
यहाँ पर सच्चे लोगों को कोई जीने नही देता !!

पी-पी के अश्क आज तक जीता रहा हूँ मै !
इस प्यासे को 'नीर' भी कोई पीने नही देता ! !

6 टिप्‍पणियां:

sangeeta ने कहा…

neer ,
bahut achchhi abhivaykti hai.
जवां जिस्मों की राहों में सभी पलकें बिछाते हैं !
कोई बेबस बुढापे को सहारा क्यों ? नही देता ! !
bahut umda soch.
badhai

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया.

रंजना ने कहा…

waah..bahut sundar panktiya...sahi kaha aapne.

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

सुन्दर!

NirjharNeer ने कहा…

Ranjana jii

aap jaisa vyaktitav kisi ki tariif mai kuch kahe yakinan ye uske liye fak'r ki baat hai..

गहरे अंतस का एक कोना,
प्रिय कभी उस ओर न जाना.

वहाँ बसी कुछ कोमल यादें,
खोया बचपन गया जमाना.

टूटी फूटी फटा पुराना,
गुडिया गहने और खिलौना.

कथा कहानी परियों वाली.
बिना बात के हँसना रोना.

माँ की लोरी,लाड पिता का,
संगी साथी संग झगड़ना.

नन्हें पलकों मे बसता वो,
सुंदर सुंदर स्वप्न सलोना.


aapki ye panktiya padh ke aisa laga jaise koi purani pehchan hai aapse anjanepan ka ahsaas hi nahi hua .
aapki in panktiyoN pe aapko baNdhaiii

NirjharNeer ने कहा…

Dr. saheb .sach kahooN to Gopaldas Neeraj ji ke geet ki yaad dilate ho aap.

kaarvaaN gujar gaya ..gubar dekhte rahe

or ho bhi kyu nahii ek hi shahar ke jo thahre


ye pankti bahot sundar lagiii..

राह में जब थकान को देखा,
देर तक आसमान को देखा।

मैनें टूटे हुए परों को नहीं ,
अपने मन की उड़ान को देखा।

वो मेरे घर कभी नहीं आया,
जिसने मेरे मकान को देखा।

जल गया रोम और नीरो ने
सिर्फ़ मुरली की तान को देखा।

तीर कातिल था; ये तो जाहिर है,
क्या किसी ने कमान को देखा?

aap aaye saraha ye mere liye shobhagy ki baat hai ..