गुरुवार, 23 अक्तूबर 2008

चाँद की बात चाँद से ...

चाँद की बात चाँद से कर लूँ !
एक हसीं ख़्वाब आँख में भर लूँ !!

चाँद की बात चाँद से कर लूँ .......

चाँद मेरा भी हमसफर होगा !
मैं भी ग़र शब से दोस्ती कर लूँ !!

चाँद की बात चाँद से कर लूँ .......

ए-चाँद ले तो जरा तू भी ओट बादल की !
जुल्फ उसकी मैं हटाने की हिमाकत कर लूँ !!

चाँद की बात चाँद से कर लूँ .......

उतर के देख जरा उनकी छत से आँगन में !
हुस्न से पूछ जरा मैं भी मोहब्बत कर लूँ !!

चाँद की बात चाँद से कर लूँ .......

चुरा के रख लूँ चाँद को सब से !
हरसू बदल की तरह मैं भी अँधेरा कर लूँ

चाँद की बात चाँद से कर लूँ .......

6 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

वाह ! बहुत खूब.......ये हुई न बात.
दिल के चाँद पर से बादलों को हटाकर देखो,कितना कुछ रौशन हो जाता है.
बहुत सुंदर लिखा है,शाबाश.........ऐसे ही लिखते रहो.

मनुज मेहता ने कहा…

bahut khoob bhai jaan
bahut hi aachi gazal, maza aaya padh kar.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है...चाँद से बात कौन नहीं करना चाहेगा...???
नीरज

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा ने कहा…

बहुत सुंदर ...लिखते रहो.

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

Chand ko char chand laga diye aapne apni kavita men. Pahli bar aapke blog ko visit kiya, achha laga. Thoda afsos bhi hai ki shayad pahle achhi rachnayen miss ki hongi.

makrand ने कहा…

bahut sunder rachan