बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

गाँव का बदलता स्वरूप ।

शहर का ना था रंग जब गाँव में !
बसेरा खुशी का था तब गाँव में !!

झूले ना पनघट ना बच्चों का जमघट !
ना सजती है चौपाल अब गाँव में !!

ना कुस्ती के दंगल ना करतब नटों के !
ना लगते है मेले ही अब गाँव में !!

खेतों में बनते हुए गुड़ की खुशबू !
अब आती कहाँ है किसी गाँव में !!

ना बैलों की जोड़ी ना मिटटी के चूल्हे !
ना छप्पर बचा अब कोई गाँव में !!

ना कुल्हड़ में पानी ना पत्तों पे खाना !
बस है चाय चम्मच ही अब गाँव में !!

ना चाचा ना चाची ना ताऊ ना ताई !
चलन अंकल अंटी का अब गाँव में !!

8 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

क्या कहूँ ? आपकी कविता ने भावुक कर दिया.बहुत ही सुंदर मनमोहक भावपूर्ण लिखा है आपने.सचमुच आपने जो चित्र खींचा,बचपन में गाँव की वही तस्वीर देखि थीं जिस से आज भी मन दमकता है.पर वर्तमान में दशा है उस से मन बड़ा दरकता है.बहुत सही आकलन है आपका.

संगीता पुरी ने कहा…

बिल्कुल सही कह रहें हैं आप.... हमारे गांव अब वैसे नहीं रहे .... वे काफी बदल गए हैं।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

अब कहाँ है वह गांव ..सिर्फ़ किताबो के किस्से बन कर रह गए हैं ..सही लिखा है आपने

दीपक ने कहा…

आपने दिल की बात कही मित्र !!

श्यामल सुमन ने कहा…

भावपूर्ण और सच्चाई को उकेरती आपकी यह रचना अच्छी लगी। साथ ही यह भी सच है कि गाँव अब भी गाँव ही है। वहाँ सीधे सादे सरल लोग आज भी हैं, मिल्लत भी है, सौहार्द भी है। मुझे मुनव्वर राणा साहब याद आते हैं-

तुम्हारे शहर में मैय्यत को भी सभी काँधा नहीं देते।
हमारे गाँव में छप्पर भी सभी मिलकर उठाते हैं।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

एक बार गाँव की कशिश खींच ले गई नानी के गाँव में। जो आपने लिखा है वही मेरे बचपन में था मेरी नानी का गाँव। फिर से देखने की ललक हुई देखने की तो दोस्त को लेके गया। और दो घंटे से ज्यादा रुक नही पाया। सब कुछ बदल गया था।
आपने काफी सुन्दर लिखा भावुक कर दिया।

abha ने कहा…

kamaal ka likha hai ji apne...

अवधेश पाण्डेय 'awadh' ने कहा…

आपकी कविता हर एक ग्रामीण परिवेश से शहर आये व्यक्ति के दिल को छू जाने वाली है. जिसने आज से १० वर्ष पहले का गाँव देखा है उसे बहुत परिवर्तन दिखेगा, गाँव का विकास भी जरूरी है, लेकिन उसके मूल रूप से खिलवाड़ किये बिना हो तो अति उत्तम है.
मैंने अपनी इच्छा से दो पंक्तियाँ जोड़ी हैं, शायद किसी को छू जाएँ ताकि वो अपने गाँव जाकर वहां के लिए कुछ करे.

मिलके सब जो सोचे जग का भला,
तो निराशा ना होगी कोई गाँव में.
चलो फिर से लौटें, पुरानी जगह पर,
बसायें स्वर्ग फिर उसी गाँव में.